भगवान के समान नहीं कोई दूसरा

एक समय में मान्यता थी कि जब-जब बादल गरजते हैं, बिजली कड़कती है, मतलब इंद्र देवता प्रसन्न हैं लेकिन इस विज्ञान के युग में यह मान्यता नहीं रह गई। आज वह मान्यता हो गई है जो वैज्ञानिक तर्क से कहते हैं कि कोई देवता नहीं है, यह सब प्राकृतिक नियम है जिसके तहत वर्षा होती है, बिजली कड़कती है, बादल गरजते हैं, इसमें कोई भी देवता की करामात या चमत्कार नहीं है।

मैंने जिक्र किया था कि चंद्रमा देवता है यह एक मान्यता है, चंदा मामा है। चांद की पूजा लगभग हर धर्म में की गई है। इस्लाम में ईद तब होती है जब चांद दिखाई देता है। हिंदू धर्म में तो चंद्रमा को सदा ही देवता कहा गया है। ऋषियों ने जो यज्ञ किए, उनमें चंद्रमा का भाग निकाला जाता था, एक व्यक्ति की तरह। सूर्य देवता का भाग निकाला जाता था और पंच तत्वों को भी पांच मरे हुए, तत्व नहीं पांच जीवित तत्व माना गया।
इसलिए आकाश देवता, वरुण देवता, अग्नि देवता, पृथ्वी देवी है, माता है इन्हें पूजना है, ऐसी हिंदू धर्म की मान्यता है।

कुछ मान्यताएं एक देश में हैं तो दूसरे देश में नहीं हैं। एक मज़हब में जो मान्यता है, दूसरे मज़हब में वह मान्यता लागू नहीं होती। हिंदू धर्म नदी को भी पूजता है, पेड़ को भी पूजता है, तैंतीस करोड़ देवी-देवताओं को पूजता है लेकिन इस्लाम में ऐसी कोई मान्यता नहीं है।

हिंदू धर्म में शैतान की कोई मान्यता नहीं है कि शैतान होता है लेकिन इस्लाम मानता है कि शैतान और खुदा दो हैं, अलग-अलग सत्ता हैं। ईसाई भी मानते हैं कि खुदा और शैतान दोनों हैं लेकिन हिंदू धर्म में ऐसी कोई मान्यता नहीं है। राक्षसों को तो माना है। सुर-असुर संग्राम हुए हैं लेकिन ऐसी कोई मान्यता नहीं है कि परमात्मा के समानांतर कोई दूसरी सत्ता है जिसको हम शैतान बोल सकें।

भारत के ऋषि ज्यादा गहरे चिंतक थे और उन्होंने राक्षस की अलग से कोई सत्ता नहीं मानी लेकिन यह जरूर स्वीकार किया कि हर व्यक्ति के मन में दैव और आसुरी वृत्तियां होती हैं। सतोगुणी वृत्तियों वाले देव और आदमी की ही जो रजोगुणी, तमोगुणी वृत्तियां और ख्याल होते हैं, उन्हें राक्षस कह दिया। ये दोनों व्यक्ति के मन में हैं। मन तक तो मानी है देवता और राक्षस की सीमा, लेकिन ब्रह्म, परमात्मा तक ऐसी कोई सत्ता नहीं मानी।

परमात्मा का न तो सजातीय कोई है, न परमात्मा के विजातीय कोई है, न परमात्मा के स्वगत भेद में कोई है। परमात्मा के समानांतर कोई दूसरा नहीं है। सजातीय पुरुष-पुरुष एक जात हो गई और स्त्री-स्त्री एक जात हो गई। यह होता है सजातीय। दूसरी हो गई विजातीय-स्त्री और पुरुष का फर्क हो गया। एक जाति का दूसरी जाति से भेद। एक होता है स्वगत भेद, मानो तुम एक ही शरीर के अंगों में फर्क करते हो, ये हाथ हैं, ये पैर हैं। सबके अलग-अलग कार्य हैं। अपने ही जिस्म में तुम अलग-अलग अंगों का भेद मानते हो।

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