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पितृ ऋण से मुक्ति का अवसर देता है श्राद्ध पक्ष, जानिये कुछ बड़ी बातें

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शास्त्रों में मनुष्य के लिए तीन ऋण कहे गये हैं- देव ऋण, ऋषि ऋण व पितृ ऋण। इनमें से पितृ ऋण को श्राद्ध करके उतारना आवश्यक है। क्योंकि जिन माता-पिता ने हमारी आयु, आरोग्यता तथा सुख सौभाग्य की अभिवृद्धि के लिए अनेक प्रयास किये, उनके ऋण से मुक्त न होने पर हमारा जन्म लेना निरर्थक होता है। इसे उतारने में कुछ अधिक खर्च भी नहीं होता। वर्षभर में केवल एक बार अर्थात् उनकी मृत्युतिथि को सर्वसुलभ जल, तिल, यव, कुश और पुष्प आदि से उनका श्राद्ध सम्पन्न करने और गौ ग्रास देकर एक, तीन या पांच ब्राह्मणों को भोजन करा देने मात्र से यह ऋण उतर जाता है। इस वर्ष श्राद्ध पक्ष 14 सितंबर से शुरू होगा। 13 सितंबर को पूर्णिमा का श्राद्ध है तथा 25 सितंबर को एक साथ दो श्राद्ध के दिन होंगे। 28 सितंबर को श्राद्ध का अंतिम दिन है।

क्या करना चाहिए
जिस मास की तिथि को माता पिता की मृत्यु हुई हो, उस तिथि को श्राद्ध आदि करने के अलावा आश्विन कृष्ण पक्ष में उसी तिथि को श्राद्ध, तर्पण, गौ ग्रास और ब्राह्मणों को भोजन कराना आवश्यक है। इससे पितृगण प्रसन्न होते हैं और हमें सौभाग्य की प्राप्ति होती है। जिस स्त्री के कोई पुत्र न हो, वह स्वयं ही अपने पति का श्राद्ध कर सकती है। भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा से प्रारम्भ करके आश्विन कृष्ण अमावस्या तक सोलह दिन तक पितरों को तर्पण और विशेष तिथि को श्राद्ध अवश्य करना चाहिए। इस प्रकार करने से यथोचित रूप में पितृ व्रत पूर्ण होता है।



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