असम में राजनीतिक फायदे के लिए तय की जाती हैं एनआरसी की शर्तें

असम देश का एकमात्र ऐसा राज्य है, जिसका राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) है। इसे पहली बार 1951 में तैयार किया गया था। उस वक्त असम राज्य के नागरिकों की संख्या 80 लाख थी। 1985 में केंद्र सरकार और असम के छात्र संगठन आसू के बीच असम समझौता हुआ था। इसी समझौते के आधार पर 2005 में एनआरसी अद्यतन करने का फैसला किया गया और तभी से राज्य में एनआरसी की प्रक्रिया शुरु हुई। असम में सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) अद्यतन करने का काम लगातार किसी न किसी बहाने अधर में लटकाया जाता रहा है और यह एक ऐसी लम्बी प्रक्रिया बन चुकी है जो समाप्त होने का नाम ही नहीं ले रही है।
दूसरी तरफ एनआरसी में नाम शामिल नहीं होने की आशंका से राज्य का अल्पसंख्यक तबका बुरी तरह घबराया हुआ है। प्रारूप एनआरसी प्रकाशित करने की अंतिम समय सीमा में कई बार तब्दीली हो चुकी है। इसका प्रकाशन 30 जून को करने की घोषणा की गई थी, जिसे एक बार फिर एक महीने के लिए टाल दिया गया है। राज्य सरकार की तरफ से सुप्रीम कोर्ट में दलील दी गई है कि बाढ़ की वजह से एनआरसी को अद्यतन करने का काम प्रभावित हुआ है और इसे समय पर प्रकाशित कर पाना मुमकिन नहीं है।
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार 2 जुलाई को एनआरसी पर सुनवाई के दौरान एनआरसी के प्रदेश संयोजक प्रतीक हाज़ेला ने सुप्रीम कोर्ट में मुहरबंद लिफ़ाफ़े में एक गोपनीय रिपोर्ट प्रस्तुत की, जिसके आधार पर अदालत ने इस प्रक्रिया को लेकर कुछ जरूरी निर्देश जारी किये। अदालत ने एनआरसी के पहले प्रारूप में शामिल ऐसे 1.50 लाख नामों को हटाने की इजाजत दे दी, जिन्हें जांच के बाद अवैध पाया गया। इसके अलावा 64,000 संदिग्ध मतदाताओं और 4,500 विदेशियों के नामों को लंबित रखने और उनके वंशजों की शिनाख्त करने की बात कही गई।
सवाल पैदा होता है कि राज्य सरकार ने इस तरह के जरूरी निर्देश अदालत से प्राप्त करने में इतनी लेटलतीफी क्यों की ? क्यों उसने अंतिम समय सीमा गुजर जाने तक अदालत को वास्तविक तथ्यों से अवगत नहीं करवाया ? एनआरसी के प्रकाशन का मूल मकसद विदेशी मुक्त एनआरसी तैयार करना है। ऐसी स्थिति में 4,500 विदेशियों के नामों को लंबित रखने का क्या मतलब निकलता है ?
असम में पिछले कई सालों से एनआरसी अद्यतन करने की प्रक्रिया चलती रही है। इस दौरान दिसपुर की सत्ता संभालने वाली अलग-अलग दलों की सरकारें अपने राजनीतिक फायदे के हिसाब से एनआरसी की शर्तें तय करती रही हैं। उदाहरण के तौर पर राज्य सरकार ने पहचान के दस्तावेज के तौर पर ग्राम पंचायत के प्रमाण पत्र को स्वीकार करने से मना कर दिया। फिर मूल निवासी का बखेड़ा खड़ा किया गया, जिसको लेकर अदालत ने बाद में सरकार को फटकार भी लगाई।
यह बात आसानी से समझी जा सकती है कि असम के दूरदराज के ग्रामीण इलाकों में रहने वाले लोगों के लिए पंचायत का प्रमाण पत्र ही पहचान का वास्तविक दस्तावेज हो सकता है। इसी तरह मूल निवासी की जो कसौटी रखने की कोशिश की गई, उसके आधार पर तो आहोम साम्राज्य की नींव रखने वाले शासक सुकाफा भी विदेशी माने जा सकते हैं और नव वैष्णव धर्म के प्रवर्तक शंकरदेव को भी कन्नौज का निवासी बताया जा सकता है, चूंकि उनके पूर्वज वहीँ से असम आये थे।
राज्य सरकार की तरफ से जिस तरह सूची में नाम को शामिल करने के लिए शर्तों में बदलाव किया जाता रहा है, उससे राज्य के अल्पसंख्यक तबकों के बीच यही सन्देश जाता रहा है कि राज्य सरकार किसी न किसी बहाने उनको एनआरसी से बाहर रखने की कोई गहरी साजिश रच रही है। जब लोगों के नाम एनआरसी में शामिल नहीं किये जायेंगे तो मजबूर होकर लोग अदालत का दरवाजा खटखटाएंगे और इस तरह यह प्रक्रिया अनंत काल तक अधर में झूलती ही रहेगी।
फिलहाल एनआरसी के प्रकाशन को टालने के लिए राज्य में बाढ़ के पहले चरण का बहाना बनाया गया है। पहले चरण की बाढ़ अब नहीं रह गई है लेकिन सितम्बर तक इस तरह कई बार बाढ़ आ सकती है। बाढ़ से सालाना तबाही होती है और इस साल भी बाढ़ का भीषण रूप देखने को मिल सकता है। वैसी स्थिति में सवाल पैदा होता है कि क्या राज्य सरकार 30 जुलाई की समय सीमा का पालन करते हुए एनआरसी का प्रकाशन कर पाएगी या एक बार फिर अदालत से तारीख बढ़ाने की गुहार लगाएगी?
वैसे भी राज्य का प्रबुद्ध वर्ग मानता है कि एनआरसी को टालने का खेल राजनीतिक दलों की तरफ से खेला जाता रहा है और अंतिम एनआरसी को प्रकाशित होने में कई साल का वक़्त लग सकता है। इस वर्ग का यह भी मानना है कि केंद्र की भाजपा सरकार अगर नागरिकता संशोधन विधेयक को पारित कर देती है तो एनआरसी की राह में अनगिनत अड़चन खड़ी हो जायेगी।
इस बीच संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार संस्था द्वारा नियुक्त चार विशेष व्यक्तियों ने संयुक्त रूप से एनआरसी अद्यतन करने की प्रक्रिया के नाम पर असम में बंगाली मुसलमानों के साथ कथित भेदभाव पर गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए विदेश मंत्री सुषमा स्वराज को पत्र लिखा है। बीते 11 जून को लिखे गए आठ पन्नों के इस पत्र में कहा गया है कि ‘एनआरसी अपडेट प्रक्रिया ने असम में उन बंगाली मुसलमानों के बीच चिंता और भय को जन्म दे दिया है जो अपनी नागरिकता साबित करने के लिए आवश्यक दस्तावेज रखने के बावजूद एक विदेशी के रूप में कथित स्थिति के कारण लंबे समय से भेदभाव के शिकार होते रहे हैं। ‘पत्र में आगे लिखा गया है कि ‘जिन लोगों को अंतिम एनआरसी से बाहर रखा जाएगा, उन लोगों के हितों की रूपरेखा तैयार करने वाली कोई आधिकारिक नीति नहीं है। यह बताया गया है कि उन्हें विदेशी माना जाएगा और पूर्व जांच के अभाव में उनके नागरिकता अधिकारों को रद्द कर दिया जा सकता है। बाद में विदेशियों को ट्रिब्यूनल में अपनी नागरिकता साबित करने के लिए कहा जा सकता है।’ संयुक्त राष्ट्र के इस पत्र में एनआरसी अद्यतन के संबंध में गलत नोटिस के आठ अलग-अलग आरोपों पर 60 दिनों के भीतर भारत सरकार से प्रतिक्रिया देने के लिए कहा गया है। इस पत्र में कहा गया है कि संयुक्त राष्ट्र के ह्यूमन राइट्स काउंसिल को इस रिपोर्ट पर विचार करने के लिए भेजा जाएगा।

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