समाचार पत्रों का इतिहास

आधुनिक भारत निर्माण में ‘‘सकारात्मक मीडिया’’ का महत्व

न बंदूक उठाओे, न तलवार निकालो, अगर तोप मुकाबिल हो तो, अखबार निकालो। यह आपने कई वक्ताओं के मुंह से सुना होगा या पढ़ा होगा, लेकिन बहुत कम लोग अखबार के इतिहास और संघर्ष के संदर्भ में जानते हैं। आमतौर पर यह धारणा है कि अखबार या तो बडे़-बड़े पूंजीपतियों की होती है जो वे अपने औद्योगिक संस्थानों की सुरक्षा व सरकार, प्रशासन पर अपना दबाव बनाने के लिए निकालते हैं या वे लोग अखबार निकालते है जिन्हें कोई काम-धंधा नहीं होता। इस धारणा को बदलने का प्रयास भी नहीं किया गया बल्कि 1990 का वर्ष आते-आते अखबार प्रकाशन की धारणा और मीडिया से जुड़ने का अर्थ ही बदल गया। परिणाम सामने है, इसके संदर्भ में आप हमसे बेहतर मूल्यांकन कर सकते हैं।
सकारात्मक सोच को कायम रखने के लिए यह आवश्यक है कि आने वाले युवा पत्रकार एवं अखबार के स्वामी, प्रकाशक, मुद्रक और सम्पादक को यह बतलाया जाए की अखबार क्या होता है, अखबार को अखबार बनने में कितनी कुर्बानी देनी पड़ी, इसमें सेवा देने वालों ने कितना त्याग किया, किस कदर संघर्ष किया, कितने बलिदान के बाद अखबार की ‘शक्ति और महत्व’ को सर्वोच्च स्थान प्राप्त हुआ। आजादी के बाद भी जब संविधान लिखा गया उस वक्त भी इसे पूर्ण स्वतंत्र रखा गया। संविधन में कार्यपालिका, विधायिका एवं न्याय पालिका को अधिकार और कत्र्तव्य की सीमा में बांध गया, लेकिन समाचार पत्र को स्वतंत्र रखा गया। इस आशा और विश्वास के साथ कि, समाचार पत्र इन तीनों के साथ, आम जनता के बीच सेतु का कार्य करेगा और अपने उच्च सिद्धांतों का पालन करते हुए राष्ट्र निर्माण में स्वतः कार्य करता रहेगा।
यदि किसी से यह पूछा जाये कि समाचार पत्रों का प्रकाशन किस प्रकार आरंभ हुआ और पहले पत्रकार कौन थे तो तरह-तरह के उदाहरण दिया जाएगा और बताया जाएगा कि देवट्टषि नारदजी, फिर महाभारत काल में संजय, पत्रकार थे जो संवाद सूचक का कार्य किया करते थे लेकिन समाचार पत्रों के प्रकाशन के इतिहास के संदर्भ में सच्चाई उस वक्त सामने आयी जब नेशनल बुक ट्रस्ट आॅफ इंडिया ने प्रथम संस्करण 1991 ;शक 1913द्ध चंचल सरकार, 1986 का अनुवाद नरेन्द्र सिंहा द्वारा नेहरू बाल पुस्तकालय के लिए समाचार पत्रों की कहानी के रूप में प्रकाशित किया गया।
समाचार पत्रों का प्रकाशन का इतिहास जानने के लिए रोम के इतिहास के उस काल की ओर लौटना पड़ेगा जब वहां जूलियस सीजर का राज्य था। उसने सर्व साधारण के लिए हस्तलिखित जन-घोषणाएं जारी करना शुरू किया, जिसे ईसा से 59 वर्ष पहले ‘अक्टा डिउरना’ कहा जाता था इसका अर्थ ‘डेली इवेंट्स’ दैनिक घटनाएं होती हैं। इसमें सीनेट में हुई बहस का संक्षिप्त विवरण लिखा होता था। इसका सीधा मकसद था लोग उन्हें पढ़ सके इसके लिए सभी आम जगहों में दीवारों पर लगा दिया जाता था। लेकिन शीघ्र ही कुछ सरकारी अधिकारियों ने इन पर यह कहकर आपत्ति की कि इससे लोगों को उनके बारे में ऐसा बहुत कुछ मालूम हो जाता है जो उन्हें मालूम नहीं होना चाहिए। इसलिए यह समाचार साधन बंद कर दिया गया। शायद अखबारों पर सेंसर लगाने की ओर यह पहला कदम था।
चीनियों ने छपाई तकनीक की खोज 15 वीं सदी से बहुत पहले ही कर ली थी, 15वीं सदी आते-आते यूरोप में छपाई का काम शुरू हो गया। इसके बाद छपा हुआ या मुद्रित शब्द संचार का सबसे अधिक महत्वपूर्ण साधन बन गया। इसके बाद समाचार पत्रों के प्रकाशन में अधिक देर नहीं लगी। आरंभिक समाचार पत्र सोलहवीं सदी में निकले, जिनमें मुख्यतः वाणिज्य संबंधी समाचार होते थे, चूंकि सरकार के निर्णयों का वाणिज्य और व्यापार पर प्रत्यक्ष रूप से प्रभाव पड़ता था इसलिए बाद में राजनीतिक समाचार भी छपने लगे। आरम्भिक दिनों में प्रकाशित युद्ध संबंधी समाचारों में एक समाचार 1513 में ‘‘ द ट्रिव एनकाउंटर आॅफ द बैटिल आॅफ फलोडन फील्ड’’ नामक एक ‘‘न्यूज बुक’’ में प्रकाशित हुआ। इन आरंभिक समाचारों को हम आज के समाचारपत्रों के बीज के रूप में देख सकते है, जिनमें न केवल राजनीतिक और व्यापार संबंधी समाचार छपे बल्कि वैसे भी प्रकाशित हुए जिन्हें आजकल ‘‘सामयिक विषय’’ कहा जाता है। समान्य रूची का पहला समाचार पत्र जर्मन भाषा में 1609 में प्रकाशित हुआ। इसका नाम ‘‘अविका रिलेशंस ओडर जोइतुंग’’ था। 1816 में बंगला गजट गंगाध्र भट्टाचार्य ने शुरू किया और राजा राम मोहन राय के विचारों से प्रभावित होकर प्रचार करने लगे। जबकि भारतीय समाचार पत्रों के इतिहास में हिन्दी समाचार पत्र ‘‘ उदंतमार्तण्ड’’ का नाम आता है जिसका प्रकाशन 30 मई 1826 को हुआ और इसके सम्पादक युगल किशोर शुक्ला थे। 1850 में समयदानिमार्तण्ड नामक दूसरा साप्ताहिक समाचार पत्र इन्होंने शुरू किया लेकिन अंग्रेजों ने दोनों समाचार पत्र बंद करा दिया।
1829 में राजा राम मोहन राय और द्वारिका प्रसाद ठाकुर ने मिलकर ‘‘बंगदूत’’ नामक समाचार पत्र का प्रकाशन शुरू किया, जिसके सम्पादक नील रत्न हलधर थे और हिन्दी, अंग्रेजी, बंगाली और फारसी भाषा में इसका प्रकाशन किया जाता था, सती प्रथा जैसी बुराईयों के विरूद्ध प्रचार, सरकार की आलोचना इसमें की गई। 1854 में प्रथम दैनिक समाचार पत्र ‘‘सुध वर्षण अमृत वर्षा’ का प्रकाशन कलकत्ता से हुआ जिसके सम्पादक, प्रकाशक श्याम सुन्दर सिंह थे। 1850 से 1857 के बीच प्रकाशन के क्षेत्र में ढ़ेर सारे लोग आये और उन्होंने कई प्रकाशन शुरू किया जिसमें ‘‘बनारस अकबर’’,‘‘सुधाकर तत्व बोधनी’’, ‘‘पत्रिका’’, ‘‘सत्य’’ आदि प्रमुख कहे जा सकते हैं।
इतिहास पर अगर गम्भीरता पूर्वक मंथन किया जाए तो महावीर प्रसाद द्विवेदी द्वारा पत्रिका सरस्वती को हिन्दी समाचार के लिए मापदंड माना जा सकता है।
इससे प्रभावित होकर कई अच्छे अखबारों का प्रकाशन हुआ, जिसमें ‘‘भारत मित्र’’, ‘‘सरसुध निधि’’ , ‘‘उचित वक्ता’’, हिन्दी बंगवासी’’ का नाम प्रमुखता से लिया जाता है।
19वीं शताब्दी के आखरी तीस वर्षों में बाल मुकुन्द गुप्ता और अम्बिका प्रसाद वाजपेयी के नेतृत्व में प्रकाशित होने वाला ‘‘भारत मित्र’’ सबसे ज्यादा पढ़ने वाला समाचार पत्र बन गया। 1918 में नये दैनिक समाचार पत्र का प्रकाशन मुम्बई, कलकत्ता और पटना बिहार से शुरू हुआ। इनमें भारत मित्र के मुकाबले के दो थे, ‘‘श्री वैंकटेश्वर समाचार’’ और ‘‘कलकत्ता समाचार’’ बाद में बंद हो गये और विश्वामित्र शुरू हुआ जिसमें भारत मित्र को कड़ी टक्कर दी।
अगर यह कहा जाय कि पहले विश्व युद्ध के समय हिन्दी पत्रकारिता का उदय हुआ तो गलत नहीं होगा। गंगा प्रसाद गुप्ता, नंद कुमार, देव धर्मा, एम.पी. द्विवेदी, हरिकृष्ण जौहर, छोटे राम शुक्ला इन्द्र विद्या वाचस्पति, श्री राम पांडे, लक्ष्मी नारायण गाडे, नर्मदा प्रसाद मिश्रा ये प्रमुख नाम है जिन्होंने हिन्दी पत्रकारिता को धार प्रदान करने में अहम माने जाते हैं।
पत्रकारिता के क्षेत्रा में देश भक्ति के लिए प्रसिद्ध गणेश शंकर विद्यार्थी ने 1913 में कानपुर से प्रताप का प्रकाशन प्रारम्भ किया और 1913 में हिन्दु-मुस्लिम एकता के लिए सर्वोच्च बलिदान देकर पत्रकारिता जगत में अमर हो गये।
कृष्ण दत्त पालिवाल ने आगरा से ‘‘सैनिक’’ समाचार पत्र का प्रकाशन किया जो पश्चिमी उत्तर प्रदेश का राष्ट्रवादी प्रमुख समाचार पत्र माना जाता था। स्वामी श्रद्धानंद ने ‘‘वीर अर्जुन’’ हिन्दी और उर्दू समाचार पत्र तेज का प्रकाशन किया। वे कांग्रेसी नेता थे, उनकी हत्या के बाद विद्यावाचस्पति और लाला देशबंधु गुप्ता ने इन दोनों अखबारों का प्रकाशन जारी रखा। 1907 में सभी समाचार पत्र और पत्रिका ने अंग्रेजी शासन के खिलाफ आवाज बुलन्द की जिसमें प्रमुखता से नाम ‘‘नरसिम्हा’’ और ‘‘देवनगर’’ पत्रिका का आता है, नरसिम्हा के सम्पादक थे, अम्बिका प्रसाद वाजपेयी जो लोकमान्य तिलक के अनुयायी थे। 1920 में दैनिक आज अखबार का प्रकाशन बनारस से शुरू हुआ, जिसने स्वतंत्रता संग्राम में अहम भूमिका अदा किया। जिसके प्रथम सम्पादक श्री प्रकाश और उनके सहयोगी बावू राव विष्णु पराकर थे। ‘‘आज’’ अखबार का प्रभाव उत्तर प्रदेश, बिहार और नेपाल तक था। सम्पूर्ण अखबार का भाव पहली बार नजर आया जिसकी खास बात यह थी कि अंतराष्ट्रीय और राष्ट्रीय मुद्दे समान रूप से डाले जाते थे। आज अखबार के उत्तर प्रदेश और बिहार से 1990 में 13 संस्करण प्रकाशित हो रहे थे और इस लेख के लेखक ललित ‘सुमन’ दरभंगा ब्यूरो के चीपफ के रूप में अपनी सेवा दे चुके हैं।
1920 में ही बाबू राजेन्द्र प्रसाद ने साप्ताहिक ‘‘देश’’ की शुरूआत की थी जो बाद में बंद कर दिया गया। 1924 में 102 हिन्दी अखबार भारत में हो चुके थे। 1926 तक हिन्दी दैनिक समाचार पत्र की स्थिति बेहतर नहीं कही जा सकती थी। ‘‘आज’’, ‘‘बनारस स्वतंत्र’’, ‘‘कलकत्ता समाचार कलकत्ता, ‘‘सवाधों भारत ‘‘मुम्बई’’, ‘‘लोकमत’’ जबलपुर, ‘‘वारीमन’’ कानपुर, ‘‘मिलाप’’ लाहौर के माध्यम से स्वतंत्राता संग्राम को हिन्दी पत्रकारिता ने गति प्रदान करने का काम किया, वहीं हिन्दी पत्रकारिता के मापदंड को भी उंचा किया। जिस कारण महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, आन्ध््रा प्रदेश हैदराबाद से भी हिन्दी समाचार पत्र का प्रकाशन प्रारम्भ हुआ। 1936 में हिन्दुस्तान, समाचार पत्र का प्राकशन शुरू हुआ। आजादी जब 1947 में मिली उसके बाद हिन्दी पत्रकारिता का पुनः उदय हुआ क्योंकि हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाये जाने से इसे बल प्राप्त हुआ।
1950 में नवभारत का दिल्ली से , अमृत पत्रिका का प्रकाशन इलाहाबाद से प्रारम्भ हुआ। 1964 तक हिन्दी भाषा के अखबार भारत में सबसे ज्यादा पढ़े जाने लगे थे।
आर.एन.आई. के अनुसार 2011 तक भारत में 82237 अखबार रजिस्टर्ड हैं जिसमें 32793 हिन्दी के हैं। हिन्दी समाचार की काॅपी 15 करोड़ 54 लाख 94 हजार 7 सौ 70 बताया गया है। 2018 प्रारम्भ हो चुका है, हिन्दी पत्रकारिता एवं हिन्दी मीडिया की स्थिति काफी मजबूत हो चुकी है। सकारात्मक प्रयास के बल पर ही आधुनिक भारत का निर्माण की नींव डाली जा सकती है जिस दिशा में सकारात्मक प्रयास लगातार जारी है। इंटरनेट की गति बढ़ने एवं सोशल मीडिया में भी हिन्दी के प्रयोग से अंतराष्ट्रीय स्तर पर भारत की सकारात्मक पहचान को बल मिला है।

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