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शत्रुओं पर विजय प्राप्ति हेतु किया जाता है गुरु प्रदोष व्रत

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हर महीने के कृष्ण पक्ष तथा शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी को प्रदोष व्रत होता है। हिन्दू धर्म में प्रदोष व्रत का खास महत्व होता है। इस व्रत में शिवजी की आराधना की जाती है। प्रदोष व्रत में सोम प्रदोष, मंगल प्रदोष और शनि प्रदोष का विशेष महत्व होता है तो आइए हम आपको प्रदोष व्रत की महिमा के बारे में कुछ रोचक बातें बताते हैं।
26 सितम्बर का प्रदोष व्रत है खास 
26 सितम्बर, बृहस्पतिवार को पड़ने वाला प्रदोष व्रत खास है क्योंकि इस व्रत को करने से शत्रुओं पर विजय मिलती है और दुश्मनों का नाश होता है। बृहस्पतिवार को पड़ने वाले व्रत को गुरु प्रदोष भी कहा जाता है।
प्रदोष व्रत में दिन के हिसाब से मिलता है फल
वैसे तो प्रदोष व्रत बहुत फलदायी होता है लेकिन प्रदोष व्रत का विभिन्न अवसरों पर करने का अलग महत्व होता है। रविवार को पड़ने वाले प्रदोष को रवि प्रदोष कहते हैं। रवि प्रदोष का व्रत रहने से लम्बी आयु और निरोगी काया मिलती है। सोमवार के दिन होने वाले प्रदोष को सोम प्रदोष या चन्द्र प्रदोष कहते हैं और इसे करने से आपकी इच्छाएं पूरी होती है। मंगलवार के प्रदोष व्रत को भौम प्रदोष कहा जाता है। भौम प्रदोष व्रत से रोगों से मुक्ति मिलती है और आप स्वस्थ रहते हैं। बुधवार के दिन बुध प्रदोष होता है। इस व्रत को करने से कामनाएं सिद्ध होती है। बृहस्पतिवार के दिन व्रत से शत्रुओं का नाश होता है। शुक्र प्रदोष व्रत से सौभाग्य में वृद्धि होती है। इसके अलावा शनिवार को पड़ने वाले प्रदोष व्रत से उत्तम पुत्र की प्राप्ति होती है।
व्रत से जुड़ी कथा 
स्कंद पुराण में कही गयी कथा के अनुसार एक गांव में एक विधवा ब्राह्मणी अपने बच्चे के साथ रहती थी। वह भिक्षा मांग कर अपना गुजारा करती थी। एक दिन रास्ते में लौटते समय उसे नदी किनारे एक बालक मिला। वह बालक कोई सामान्य बालक नहीं था बल्कि वह विदर्भ देश का राजुकमार धर्मगुप्त था। दुश्मनों ने उसके पिता का राज्य हड़प कर उसके पिता की हत्या कर दी थी। उसकी माता का देहांत पहले ही हो चुका था। ब्राह्मण महिला ने उस बच्चे को अपना लिया। एक दिन ऋषि शांडिल्य ने उस ब्राह्मण महिला को प्रदोष व्रत करने को कहा। प्रदोष व्रत करने से राजकुमार धर्मगुप्त का विवाह गंधर्व राज की कन्या से हो गया। उसके बाद धर्मगुप्त को उसका खोया राज्य मिल गया।



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