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इन राशियों वृश्चिक, मकर, कन्या और वृष पर मेहरबान रहेंगे शनिदेव

इन राशियों वृश्चिक, मकर, कन्या और वृष पर मेहरबान रहेंगे शनिदेव

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धर्म (DID TV) शनि का राशि परिवर्तन हर ढाई साल बाद होता है। यही कारण है कि कई राशियों पर शनि की ढैया शुरू होती है। किसी राशि पर शनि दोबारा 30 साल बाद  पहुंचता है। और अब ढाई साल तक स्वग्रही रहेंगे। शनि के इस राशि परिवर्तन पर शश नाम का विशेष राजयोग बना है। इससे आज से आने वाले समय में कई राशियों पर शुभ व अशुभ प्रभाव पड़ेगा। ज्योतिष के जानकारों के अनुसार शनि का राशियों पर यह शुभ प्रभाव मई 2020 तक रहेगा। मई के बाद शनि एक बार फिर वक्री होंगे और दिसंबर 2020 तक वक्री रहेंगे।इस राशि परिवर्तन से शनि देव मुख्य रूप से चार राशियों पर मेहरबान रहेंगे। यानी वृश्चिक, मकर, कन्या और वृष राशि के जातकों को शनि की सकारात्मक छाया रहेगी। इससे इन राशियों के जातकों को हर काम में अपेक्षा के अनुकूल शुभ फल प्राप्त होने के योग बढ़ गए हैं। वहीं पांच ऐसी राशियां हैं जिन पर शनि वक्री  रहेंगे।
15 को मकर संक्रांति

15 को मकर संक्रांति

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धर्म ( DID NEWS) दान-पुण्य का महापर्व मकर संक्रांति 15 जनवरी को मनाया जाएगा। सूर्य देव 15 जनवरी रात 2 बजकर आठ मिनट पर उत्तरायण होंगे यानि सूर्य चाल बदलकर धनु से निकलकर मकर राशि में प्रवेश करेंगे। यही वजह है कि सूर्य के दक्षिणायन से उत्तरायण होने का पर्व संक्रांति का पुण्य काल 15 जनवरी को सर्वाथ सिद्धि व रवि,कुमार योग का संयोग भी रहेगा।ज्योतिषाचार्य शोनू मेल्होत्रा ने बताया कि इस बार संक्रांति का वाहन गर्दभ होगा। संक्रांति का पुण्यकाल 15 जनवरी बुधवार के दिन भर दान-पुण्य और स्नान किया जा सकेगा। मकर राशि में प्रवेश करते ही सूर्यदेव उत्तरायण हो जाएंगे। दिन भी बड़े होने लगेंगे। इसके साथ ही धनु मलमास भी समाप्त हो जाएगा और मांगलिक कार्य शुरू होंगे। 15 जनवरी को धनु से निकलकर मकर में प्रवेश करेंगे सूर्यदेव।
जहां हैं दाढ़ी मूंछ वाले हनुमानजी

जहां हैं दाढ़ी मूंछ वाले हनुमानजी

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धर्म ( Did News ) ; सालासर बालाजी धाम को लेकर काफी कथाएं प्रचलित हैं। बताया जाता हैं कि हनुमानजी के एक भक्त मोहनदास ने काफी भक्ति और तपस्या की थी। जिससे प्रसन्न होकर हनुमानजी ने मोहनदास को दाढ़ी मूंछ में दर्शन दिए थे। भारत में श्रीराम भक्त हनुमान जी के कई चमत्कारी मंदिर हैं। जहां हनुमानजी विभिन्न रूप में विराजित हैं। लेकिन राजस्थान के चुरू जिले के सीकर नगर के समीप सालासर बालाजी का काफी प्रसिद्ध और चमत्कारी मंदिर हैं। यहां हनुमानजी बालाजी के रूप में विराजित हैं जो देश भर में दाढ़ी मूंछ वाले हनुमानजी के नाम से प्रसिद्ध हैं। यह देश का सम्भवतः पहला ऐसा मंदिर हैं। जहां हनुमानजी दाढ़ी मूंछ में विराजित हैं। इस मंदिर को लेकर कई मान्यता हैं। यहाँ आने वाले भक्तों का मनाना है कि सालासर बालाजी उनकी हर मुराद पूरी करते हैं। यहां से कोई भी खाली हाथ नहीं लौटाता है।
व्रत से सभी कार्यों में मिलती है सफलता

व्रत से सभी कार्यों में मिलती है सफलता

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धर्म (DiD News ) : सफला एकादशी के दिन पवित्र मन से प्रातः उठकर नित्य कर्म से निवृत्त होकर स्नान करें और साफ कपड़े पहनें। उसके बाद घर की साफ सफाई कर घर का मंदिर साफ करें। उसके बाद भगवान विष्णु को गंगा जल स्नान करा कर तिलक लगाएं। उसके बाद फल-फूल चढ़ाएं और भगवान की आरती उतारें। सफला एकादशी का हिन्दू धर्म में खास महत्व होता है। इस व्रत को करने से भक्त के सभी रूके हुए कार्य पूरे हो जाते हैं तो आइए हम आपको सफला एकादशी व्रत के महत्व तथा पूजा-विधि के बारे में बताते हैं। हिन्दू धर्म में एकादशी का खास महत्व है। लेकिन पौष महीने की कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को आने वाली सफला एकादशी का खास महत्व होता है। विशेष फलदायी होने के कारण धार्मिक ग्रन्थों में इसे सफला नामक एकादशी के नाम से जाना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यह एकादशी मनोकामना सफल करने वाली एकादशी है। पुराणों के अनुसार जो व्यक्ति विधिपूर
कौन थे साईं बाबा ?

कौन थे साईं बाबा ?

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 धर्म ( Did News ) : ऐसा माना जाता है कि सन् 1854 में साईं बाबा शिर्डी आए थे। वह दिव्य शक्ति के महात्मा थे। जब साईं बाबा शिर्डी आए, उस समय वह एक छोटा सा गांव था। बाद में बाबा के चमत्कार से शिर्डी की ख्याति दूर−दूर तक फैलती गई जिससे शिर्डी का विकास होता चला गया। साईं बाबा शिर्डी में एक पुरानी मस्जिद में रहा करते थे। उनके भक्तों को उनसे मिलने यहीं आना पड़ता था। साईं बाबा ने इस मस्जिद का नाम द्वारका भाई रखा था। शिर्डी में कई नई इमारतें बनने के बावजूद साईं बाबा द्वारका भाई में ही रहना पसंद करते थे। साईं बाबा ने शिर्डी में आने के बाद अपनी योग शक्ति से एक अग्नि जलाई थी जिसे धूनी कहा जाता है। इस धूनी में दिन−रात आग जलती रहती है। इस धूनी की राख को उदी कहा जाता है। साईं बाबा भक्तों को उदी दिया करते थे, इसी उदी से भक्तों के रोग दूर होते थे और उनके कष्टों का निवारण होता था। आज भी साईं बाबा के मंदि
भगवान राम एवं मां सीता का विवाह

भगवान राम एवं मां सीता का विवाह

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 धर्म (DID NEWS) जनकपुर का नौलखा जानकी मंदिर भारत और नेपाल के लोगों के लिए एक महत्वपूर्ण तीर्थ स्थल है। यह मंदिर भगवान राम एवं मां सीता को समर्पित है। यह ऐतिहासिक मंदिर हिन्दू-राजपूत वास्तुकला शैली का सुंदर नमूना है। मंदिर नेपाल के जनकपुर प्रान्त के धनुषा जिला में स्थित है। इस मंदिर को नौलखा मंदिर भी कहा जाता है। यह मंदिर 4,860 वर्ग फीट में फैला है।मंदिर के मुख्य गर्भगृह में भगवान श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण जी की शुद्ध सोने की मूर्तियां हैं। किंवदंती के अनुसार, सीताजी की यह सोने की मूर्ति इसी स्थान पर एक संत सूरदास जी को खुदाई कराने पर 1657 में प्राप्त हुई थी। इसी खुदाई वाली जगह पर नौलखा जानकी मंदिर बना है। मंदिर परिसर के आसपास 15 किलोमीटर के दायरे में 115 सरोवर एवं कुंड हैं, जिसमें गंगासागर कुंड सबसे पवित्र एवं प्रसिद्ध है। किंवदंतियों के अनुसार, इस कुंड को महाराजा जनक ने गंगाजल से भरव
सूर्यग्रहण

सूर्यग्रहण

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धर्म (DID NEWS) सूर्यग्रहण के समय कुछ कामों को वर्जित माना जाता है।साल का आखिरी सूर्यग्रहण 26 दिसम्बर को लगने वाला है।खंडग्रास सूर्यग्रहण के चलते 26 दिसंबर को नगर के मंदिरों में पूजन दर्शन एक दिन पहले ही रात को 8 बजते ही बंद हो जायेंगे। सूर्यग्रहण के चलते 12 घंटों पहले लगने वाले सूतक के चलते 25 दिसंबर बुधवार रात 8 बजे के बाद से ही मंदिरों में पूजा पाठ बंद हो जाएंगे। सूर्य ग्रहण का सूतक ग्रहण से 12 घंटे पहले 25 दिसंबर को शाम 5 बजकर 32 मिनट से शुरू हो जायेगा जिसकी समाप्ति 26 दिसंबर को सुबह 10 बजकर 57 मिनट पर होगी। सूतक काल में किसी भी तरह के शुभ कार्य नहीं किये जाते हैं। बताया जा रहा है कि यह आंशिक सूर्य ग्रहण सुबह 8.17 मिनट से शुरू हो जायेगा और इसकी समाप्ति 10:57 पर होगी। काशी समय के अनुसार, 26 दिसंबर को सूर्यग्रहण सुबह 8:21 बजे से शुरू होगा। 8:21 बजे से स्पर्श केबाद 9:40 बजे ग्रहण का मध्
धृतराष्ट्र श्राप के कारण अंधे पैदा हुए

धृतराष्ट्र श्राप के कारण अंधे पैदा हुए

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धर्म (DID NEWS)  जीवन में अक्सर ऐसा होता है कि सबकुछ होकर भी हमारे पास अंत में शून्य बचता है। महाभारत में भी कई पात्रों की कहानियां ऐसी ही है।धृतराष्ट्र के बारे में भी यह कहना कुछ गलत नहीं होगा।धृतराष्ट्र राजा होकर भी कोई ऐसा निर्णय नहीं ले सके, जिससे प्रभावित हुआ जा सके।कहा जाता है कि धृतराष्ट्र की कुंठा का सबसे बड़ा कारण था कि वो नेत्रहीन थे, इस वजह से वो हमेशा ही इस दुख में जलते रहे, लेकिन क्या आप जानते हैं कि धृतराष्ट्र का जन्म नेत्रहीन के रूप में क्यों हुआ था? धृतराष्ट्र अपने पिछले जन्म में एक बहुत दुष्ट राजा थे। एक दिन उन्होंने देखा कि नदी में एक हंस अपने बच्चों के साथ आराम से विचरण कर रहा है। उन्होंने आदेश दिया कि उस हंस की आंखें फोड़ दी जाए और उसके बच्चों को मार दिया जाये। इसी वजह से अगले जन्म वे नेत्रहीन पैदा हुए थे। उसके पुत्र भी उसी तरह मृत्यु को प्राप्त हुए जैसे उस हंस के बच्चो
लड्डू गोपाल ने भी धारण किए गर्म कपड़े

लड्डू गोपाल ने भी धारण किए गर्म कपड़े

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धर्म (DID NEWS) सर्द भरी ठिठुरन से इंसान को बचने के लिए प्रशासन ने भले ही अभी कोई इंतजाम न किया हो लेकिन रूप गौड़ीय मठ में भक्तों ने परंपरा के अनुसार अपने भगवान को गर्म कपड़े पहना दिए हैं। ब्रह्म और जीव के बीच आध्यात्मिक स्तर पर अंतर भले है लेकिन लौकिक रूप में उनके आराध्य यशोदा के नंदलाल ही हैं। कान्हा की किलकारी, नटखटपन, मोहक छवि भक्तों को आत्मीयता से भर देती है। फिर अपने ‘लाल' के वात्सल्य प्रेम में उन्हें ठंड से बचने के लिए पंरपरा अनुसार इंतजाम करते हैं।रूप गौड़ीय मठ में स्थित राधा-कृष्ण को ऊनी कपड़े, स्वेटर व कंबल पहनाया गया है। अभिषेक, पूजन व मंगला आरती के बाद भक्त मां यशोदा की तरह अपने लाल के लिए श्रद्धा भाव से स्वेटर टोपी पहनाकर पूजन-अर्चन करते हैं।गर्म व्यंजन से भोग:भगवान को गर्म कपडे़ ही नहीं पहनाते बल्कि ठंड से बचने के लिए गर्म व्यंजनों से भोग भी लगाया जाता है। मठ में प्रमुख स्वामी अव
श्रीकृष्ण से इन 3 योद्धाओं ने भी सुना था गीता का ज्ञान

श्रीकृष्ण से इन 3 योद्धाओं ने भी सुना था गीता का ज्ञान

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धर्म (DID NEWS) कहते हैं कि अगर दुर्योधन ने भगवत गीता का ज्ञान श्रीकृष्ण से ले लिया होता, तो शायद उसे जीवन का मर्म समझ में आ जाता और कुरुक्षेत्र के ऐतिहासिक युद्ध की आवश्यकता नहीं पड़ती। ऐसा नहीं है कि श्रीकृष्ण ने कभी दुर्योधन को गीता ज्ञान देने की कोशिश नहीं की, लेकिन अर्जुन ने गीता ज्ञान लेने से यह कहकर मना कर दिया कि वो स्वंय बहुत ज्ञानी है इसलिए उसे किसी भी ज्ञान की जरुरत नहीं है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि श्रीकृष्ण के मुख से सिर्फ अर्जुन ही नहीं बल्कि कई दूसरे योद्धाओं ने भी गीता सुनी थी। जब श्री कृष्ण ने पहली बार अर्जुन को भागवत गीता सुनाई थी, तब वहां अर्जुन अकेले नहीं थे बल्कि उनके साथ हनुमान जी, संजय एवं बर्बरीक भी मौजूद थे। हनुमान उस समय अर्जुन के रथ के ऊपर सवार थे। दूसरी ओर संजय को श्री वेद व्यास द्वारा वेद दृष्टि का वरदान प्राप्त था जिस कारण वे चल रही हर हलचल को महल में बैठकर